Link of the Day !
Read this other exceptional post by him, where father gets seduced by him and "offers" his daughter to him, and in between he throws his most-modern ideas on Feminism.
Manchi Pani Chesaav, Raju gaaro !
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Labels: हिंदी
जी हाँ , लिख रहा हूँ ...
जी हाँ, लिख रहा हूँ ...
बहुत कुछ ! बहोत बहोत !!
ढ़ेर ढ़ेर सा लिख रहा हूँ !
मगर , आप उसे पढ़ नहीं
पाओगे ... देख नहीं सकोगे
उसे आप !
दर असल बात यह है कि
इन दिनों अपनी लिखावट
आप भी मैं कहॉ पढ़ पाता हूँ
नियोन-राड पर उभरती पंक्तियों की
तरह वो अगले कि क्षण
गुम हो जाती हैं
चेतना के 'की-बोर्ड' पर वो बस
दो-चार सेकेंड तक ही
टिकती है ....
कभी-कभार ही अपनी इस
लिखावट को कागज़ पर
नोट कर पता हूँ
स्पन्दनशील संवेदन की
क्षण-भंगुर लड़ियाँ
सहेजकर उन्हें और तक
पहुंचाना !
बाप रे , कितना मुश्किल है !
आप तो 'फोर-फिगर' मासिक -
वेतन वाले उच्च-अधिकारी ठहरे,
मन-ही-मन तो हसोंगे ही,
की भला यह भी कोई
काम हुआ , की अनाप-
शनाप ख़यालों की
महीन लफ्फाजी ही
करता चले कोई -
यह भी कोई काम हुआ भला !
पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन-
पसीने से लथपथ ।
छूती है निगाहों को
कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूँछों की थिरकन
सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है ?
जी तो नहीं कढता है ?
कुली मजदूर हैं
बोझा ढोते हैं , खींचते हैं ठेला
धूल धुआँ भाफ से पड़ता है साबका
थके मांदे जहाँ तहां हो जाते हैं ढ़ेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन
आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे मैं
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर
आपस मैं उनकी बतकही
सच सच बतलाओ
जी तो नहीं कढता है ?
घिन तो नहीं आती है ?
दूध सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा
निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे , अगले डिब्बे मैं
ये तो बस इसी तरह
लगायेंगे ठहाके, सुरती फाँकेंगे
भरे मुँह बातें करेंगे अपने देस कोस की
सच सच बतलाओ
अखरती तो नहीं इनकी सोहबत ?
जी तो नहीं कढता है ?
घिन तो नहीं आती है ?
प्रभु तुम कर दो वमन !
होगा मेरी क्षुधा का शमन !!
स्वीकृति हो करुणामय,
अजीर्ण अन्न भोजी
अपंगो का नमन !
आते रहे यों ही यम की जम्हायियों के झोंके
होने न पाए हरा यह चमन
प्रभु तुम कर दो वमन !
मार दें भीतर का भाप
उमगती दूबों का आवागमन
बुझ जाए तुम्हारी आंतों की गैस से
हिंद की धरती का मन
प्रभु तुम कर दो वमन !
होगा मेरी क्षुधा का शमन !!
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इस चिट्ठे से प्रेरित होकर मैंने सोचा कि क्यों ना अपने कोमा-मय ब्लोग में भी कुछ लिखा जाये। कुछ समय पहले हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार निर्मल वर्मा के निधन पर मैंने ये चिठ्ठा लिखा था । उसी का देवनागरी में रूपान्तर लिख रहा हूँ। थोड़े अभ्यास के बाद शायद ज्यादा लिख सकूं ।
अन्तिम अरण्य
..... कुछ लोग कहते हैं कि वो एक दिन के बाद दूसरे दिन में रहते हैं , उस समय उनका मतलब ये ही होता है कि वो एक ही दिन में रहते हैं। जब मैं छोटा था , तब मैंने अपनी गर्मियों की छुट्टियाँ एक छोटे से कस्बाती स्टेशन में गुजारी थीं । वहां मेरे चाचा स्टेशन मास्टर थें। मैं देखा करता था कि रेल के डिब्बे जो पुराने हो जाते थे , उन्हें एक छोटी लाईन पर खड़ा कर दिया जाता था , रेल गाड़ियाँ आती और उन्हें छोड़ कर धड़धड़ाती हुई आगे बढ़ जाती । उन खाली डिब्बों में हम लुका-छुप्पी का खेल खेलते थे । कभी कभी हमे वहां अनोखी चीजें मिल जाती । किसी आदमी का मफलर , सीट के नीचे दुबका किसी लड़की का सेंडल , एक बार तो मुझे एक मुसाफ़िर कि फटी पुरानी नोटबुक भी मिली थी , जिस में पांच रूपये का चीकट नोट दबा था , पर सबसे विस्मयकारी स्मृति स्वम उस रेल के डिब्बे कि थी जो रेल कि पटरी पर खड़ा हुआ भी कहीँ नहीं जाता था ।
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anurag
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